Vijñāna Bhairava Tantra · 1.51

Vijñāna Bhairava Tantra 1.51

1.51
क्वचिद्वस्तुनि विन्यस्य शनैर्दृष्टिं निवर्तयेत् । तज्ज्ञानं चित्तसहितं देवि शून्यालयो भवेत् ॥५१॥
kvacid vastuni vinyasya śanair dṛṣṭiṃ nivartayet | tajjñānaṃ cittasahitaṃ devi śūnyālayo bhavet
anuṣṭubh
— किसी वस्तु पर (अधिकरण कारक) ; — रखकर (क्त्वान्त) ; — धीरे-धीरे (अव्यय) ; — दृष्टि को (कर्म कारक) ; — वापस खींच ले, निवृत्त करे (विधि लिङ् — णिजन्त) ; — वह ज्ञान (कर्ता कारक) ; — चित्त-सहित, मन के साथ (विशेषण — समासगत) ; — हे देवि! (सम्बोधन) ; — शून्य का आलय (निवास) हो जाए — कर्ता + विधि लिङ्

हे देवि! किसी वस्तु पर (दृष्टि) रखकर धीरे-धीरे दृष्टि को निवृत्त कर ले (खींच ले); तब वह ज्ञान चित्त-सहित (शान्त होकर साधक) शून्य का आलय (निवास) हो जाता है। (धारणा ३३)