Vijñāna Bhairava Tantra · 1.50

Vijñāna Bhairava Tantra 1.50

1.50
वस्तुषु स्मर्यमाणेषु दृष्टे देशे मनस्त्यजेत् । स्वशरीरं निराधारं कृत्वा प्रसरति प्रभुः ॥५०॥
vastuṣu smaryamāṇeṣu dṛṣṭe deśe manas tyajet | svaśarīraṃ nirādhāraṃ kṛtvā prasarati prabhuḥ
anuṣṭubh
— स्मरण किए जाते हुए पदार्थों के विषय में (सति-सप्तमी) ; — देखे हुए देश (स्थान) के विषय में (अधिकरण) ; — मन को छोड़े, हटाये (कर्म + विधि लिङ्) ; — अपने शरीर को (कर्म — समासगत) ; — निराधार करके (विशेषण + क्त्वान्त) ; — वह प्रभु (परम) प्रसरित होता है — कर्ता + वर्तमान काल

स्मरण किए जाते हुए (किसी) पदार्थ के सम्बन्ध में, या देखे हुए देश (स्थान) के सम्बन्ध में मन को छोड़ दे (विषय से हटाये); अपने शरीर को निराधार करके वह प्रभु (परम तत्त्व) प्रसरित होता है। (धारणा ३२)