Stanzas on the Divine Pulsation · 3.2

Stanzas on the Divine Pulsation 3.2

3.2
तथा स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थान्प्रणयस्यानतिक्रमात् । नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितोऽवश्यं प्रकाशयेत् ॥२॥
tathā svapne 'py abhīṣṭārthān praṇayasyānatikramāt | nityaṃ sphuṭataraṃ madhye sthito 'vaśyaṃ prakāśayet ||
anuṣṭubh
— तथा, उसी प्रकार (अव्यय) ; — स्वप्न में — पु.अधि. एक. ; — भी (अव्यय) ; — अभीष्ट अर्थ — चाहे गए विषय (कर्म कारक बहुवचन — समासगत) ; — प्रणय (भक्ति-प्रार्थना) के अनतिक्रमण (अनुल्लंघन) से — पदबन्ध ; — नित्य, सर्वदा (अव्यय) ; — और भी अधिक स्पष्ट रूप से (अव्यय) ; — मध्य (सुषुम्ना के केन्द्र) में स्थित (पदबन्ध, कर्ता कारक) ; — अवश्य, निश्चित रूप से (अव्यय) ; — प्रकाशित करे, प्रकट करे (प्रेरणार्थक, विधिलिङ्)

उसी प्रकार स्वप्न में भी, (साधक के) प्रणय (भक्ति-प्रार्थना) का अनतिक्रमण (अनुल्लंघन) करते हुए, (सुषुम्ना के) मध्य में स्थित (स्पन्द) नित्य ही अभीष्ट अर्थों को और भी अधिक स्पष्टता से प्रकाशित कर देता है।