Stanzas on the Divine Pulsation · 3.1

Stanzas on the Divine Pulsation 3.1

3.1
यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतोऽर्थान्हृदि स्थितान् । सोमसूर्योदयं कृत्वा सम्पादयति देहिनः ॥१॥
yathecchābhyarthito dhātā jāgrato 'rthān hṛdi sthitān | soma-sūryodayaṃ kṛtvā sampādayati dehinaḥ ||
anuṣṭubh
— जैसी इच्छा हो वैसी प्रार्थना किया गया (कर्ता कारक — समासगत) ; — धाता — विधाता, पोषक (स्पन्द-तत्त्व) — कर्ता कारक ; — जाग्रत् (व्यक्ति) का — षष्ठी एकवचन ; — अर्थों (विषयों) को — पु.कर्म बहु. ; — हृदय में — नपुं.अधि. एक. ; — स्थित, अवस्थित (पु.कर्म बहु. ppp √स्था) ; — सोम (चन्द्र, अपान) और सूर्य (प्राण) के उदय को — कर्म कारक — समासगत ; — करके, उत्पन्न करके (पूर्वकालिक कृदन्त √कृ) ; — सम्पादित करता है, पूर्ण करता है (प्रेरणार्थक, वर्तमान काल) ; — देही (देहधारी) के लिए — षष्ठी / सम्प्रदान

जैसे इच्छानुसार प्रार्थित किया गया धाता (स्पन्द-स्वरूप पोषक) सोम-सूर्य (अपान-प्राण) का उदय करके जाग्रत् देही के हृदय में स्थित अर्थों (इष्ट विषयों) को सम्पादित (पूर्ण) कर देता है।