प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेज्ज्ञानेनालोक्य गोचरम् ।
एकत्रारोपयेत्सर्वं ततोऽन्येन न पीड्यते ॥१२॥
prabuddhaḥ sarvadā tiṣṭhej jñānenālokya gocaram |
ekatrāropayet sarvaṃ tato 'nyena na pīḍyate ||
anuṣṭubh
— प्रबुद्ध — जागृत साधक (कर्ता कारक); — सर्वदा, हर समय (अव्यय); — स्थित रहे, बना रहे (विधिलिङ्); — ज्ञान से देखकर, अवलोकन करके (पदबन्ध, पूर्वकालिक क्रिया); — गोचर — इन्द्रिय-विषय का क्षेत्र (कर्म कारक); — एक स्थान (तत्त्व) में आरोपित करे — विधिलिङ्; — सब कुछ — नपुं.कर्म/कर्ता एक.; — उससे, तदनन्तर (पञ्चमी-वाचक अव्यय); — किसी अन्य (वस्तु) के द्वारा — नपुं.करण एक.; — पीड़ित नहीं होता, बाधित नहीं होता (कर्मवाच्य, वर्तमान काल)
प्रबुद्ध (जागृत) सदा सावधान रहे, ज्ञान से (इन्द्रिय-)गोचर का अवलोकन करे, और समस्त (जगत) को एक ही (तत्त्व) में आरोपित करे; तब वह अन्य किसी से पीड़ित नहीं होता।