एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः ।
उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥९॥
eka-cintā-prasaktasya yataḥ syād aparodayaḥ |
unmeṣaḥ sa tu vijñeyaḥ svayaṃ tam upalakṣayet ||
anuṣṭubh
— एक चिन्ता (विचार) में लीन (व्यक्ति) का — षष्ठी एकवचन — समासगत; — क्योंकि, जिससे (हेत्वर्थक सम्बन्धवाचक अव्यय); — हो, हो सकता है (विधिलिङ्ग, तृ.पु.एक. √अस्); — अपर का उदय — दूसरे (विचार) का उठना (कर्ता कारक — समासगत); — वह — पु.कर्ता एक. सर्वनाम; — किन्तु, परन्तु (विरोधार्थक अव्यय); — उन्मेष — उद्घाटन, प्रकट प्रस्फुरण (कर्ता कारक); — विज्ञेय — जानने योग्य (विधि-कृदन्त, कर्ता कारक); — स्वयं, अपने आप (अव्यय); — उस को (उन्मेष) — पु.कर्म एक.; — स्वयं लक्षित करे, स्वतः पहचाने (प्रेरणार्थक, विधिलिङ्)
एक चिन्ता (विचार) में लीन व्यक्ति के मन में जहाँ से अपर (दूसरे विचार) का उदय होता है — उसे ही उन्मेष जानना चाहिए; (साधक) स्वयं इसे लक्षित करे (पहचाने)।