Stanzas on the Divine Pulsation · 3.19

Stanzas on the Divine Pulsation 3.19

3.19
यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोदयौ । नियच्छन्भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥१९॥
yadā tv ekatra saṃrūḍhas tadā tasya layodayau | niyacchan bhoktṛtām eti tataś cakreśvaro bhavet ||
anuṣṭubh
— जब (कालवाचक सम्बन्धवाचक अव्यय) ; — किन्तु, परन्तु (विरोधार्थक अव्यय) ; — एकत्र संरूढ़ — एक ही (तत्त्व) में दृढ़तया प्रतिष्ठित (पदबन्ध, कर्ता कारक) ; — तब (कालवाचक नित्यसम्बन्धी अव्यय) ; — उसका — पु.षष्ठी एक. ; — लय और उदय — विलय और उठान (कर्म कारक द्विवचन — समासगत) ; — नियच्छन् — नियन्त्रित करता हुआ (वर्तमान कृदन्त, कर्ता कारक) ; — भोक्तृता — (सच्चे) भोक्ता-पन को (कर्म कारक, स्त्रीलिङ्ग) ; — प्राप्त करता है (वर्त. तृ.पु.एक. √इ) ; — उससे, तदनन्तर (पञ्चमी-वाचक अव्यय) ; — चक्रेश्वर — शक्ति-चक्र का स्वामी (कर्ता कारक — समासगत) ; — हो जाए, हो सकता है (विधिलिङ्ग, तृ.पु.एक. √भू)

किन्तु जब (वह) एक ही (स्पन्द-तत्त्व) में संरूढ़ (दृढ़तया प्रतिष्ठित) हो जाता है, तब उस (पुर्यष्टक) के लय और उदय को नियन्त्रित करते हुए वह (सच्चे) भोक्तृत्व को प्राप्त होता है, और उसके पश्चात् चक्रेश्वर (शक्ति-चक्र का स्वामी) बन जाता है।