Stanzas on the Divine Pulsation · 3.18

Stanzas on the Divine Pulsation 3.18

3.18
भुङ्क्ते परवशो भोगं तद्भावात्संसरेदतः । संसृतिप्रलयस्यास्य कारणं सम्प्रचक्ष्महे ॥१८॥
bhuṅkte para-vaśo bhogaṃ tad-bhāvāt saṃsared ataḥ | saṃsṛti-pralayasyāsya kāraṇaṃ sampracakṣmahe ||
anuṣṭubh
— भोगता है, अनुभव करता है (आत्मनेपद, वर्तमान काल) ; — परवश — दूसरे के अधीन (विशेषण, कर्ता कारक — समासगत) ; — भोग, अनुभव, उपभोग (कर्म कारक) ; — उस (बद्ध) भाव के कारण — पु.पञ्चमी एक. समास ; — संसरण करे, चक्र में भ्रमण करे (विधिलिङ्) ; — इसलिए, अतः (अव्यय) ; — संसार के विलय की — पु.षष्ठी एक. समास ; — उस (शिव या पशु) का — पु.षष्ठी एक. ; — कारण, हेतु (कर्म कारक) ; — हम सम्यक् कहेंगे, घोषित करते हैं (आत्मनेपद, वर्तमान काल, उत्तम पुरुष बहुवचन)

वह परवश (परतन्त्र) होकर भोग का अनुभव करता है, और उसी कारण (बार-बार) संसार में भ्रमण करता है; इस संसृति (संसार-प्रवाह) के प्रलय (निवृत्ति) के कारण को अब हम कहते हैं।