Stanzas on the Divine Pulsation · 2.4

Stanzas on the Divine Pulsation 2.4

2.4
तस्माच्छब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न या शिवः । भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥४॥
tasmāc chabdārtha-cintāsu na sāvasthā na yā śivaḥ | bhoktaiva bhogya-bhāvena sadā sarvatra saṃsthitaḥ ||
anuṣṭubh
— उससे, इसलिए (पञ्चमी-वाचक अव्यय) ; — शब्द और अर्थ की चिन्ताओं (विचारों) में (अधिकरण कारक बहुवचन — समासगत) ; — नहीं (अव्यय, निषेधार्थक) ; — वह (अवस्था) — स्त्री.कर्ता एक. ; — अवस्था, स्थिति (कर्ता कारक, स्त्रीलिङ्ग) ; — नहीं (अव्यय, निषेधार्थक) ; — जो (समापत्ति, अवस्था) — स्त्री.कर्ता एक. सम्बन्धवाचक ; — शिव (कर्ता कारक) ; — भोक्ता — अनुभोक्ता (कर्ता कारक) ; — ही, निश्चय ही (निश्चयार्थक अव्यय) ; — भोग्य भाव से (अर्थात् अनुभव्य रूप में) — करण कारक — समासगत ; — सदा, हमेशा (अव्यय) ; — सर्वत्र, सब जगह (अव्यय) ; — संस्थित, सम्यक् प्रतिष्ठित (भूत कृदन्त, कर्ता कारक)

अतः शब्द-अर्थ के विचारों में ऐसी कोई अवस्था नहीं जो शिव न हो; भोक्ता (शिव) ही भोग्य के रूप में सदा सर्वत्र स्थित है।