इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ।
स पश्यन्सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥५॥
iti vā yasya saṃvittiḥ krīḍātvenākhilaṃ jagat |
sa paśyan satataṃ yukto jīvan-mukto na saṃśayaḥ ||
anuṣṭubh
— इस प्रकार, ऐसा (उद्धरण-समापक अव्यय); — अथवा, या (विकल्पार्थक अव्यय); — जिसका — पु.षष्ठी एक. सम्बन्धवाचक; — संवित्ति — अनुभूति, बोध (कर्ता कारक, स्त्रीलिङ्ग); — क्रीडा (शिव की लीला) रूप से (करण कारक); — अखिल जगत — सम्पूर्ण विश्व (कर्म कारक); — वह — पु.कर्ता एक. सर्वनाम; — देखता हुआ (वर्तमान कृदन्त, कर्ता कारक); — निरन्तर, सतत (अव्यय); — युक्त, समाहित (इस बोध में) — विशेषण, कर्ता कारक; — जीवन्मुक्त — जीते-जी मुक्त (कर्ता कारक — समासगत); — (इसमें) कोई संशय नहीं है
अथवा जिसकी यह संवित्ति (बोध) है कि सम्पूर्ण जगत क्रीडा (शिव की लीला) ही है — वह सदा (इस दृष्टि में) युक्त रहकर देखता हुआ निःसन्देह जीवन्मुक्त है।