चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसङ्कोचिनी चित्तम् ॥५॥
citir eva cetana-padād avarūḍhā cetya-saṅkocinī cittam
sūtra
चिति ही चेतन-पद से अवरूढ़ (नीचे उतरी) होकर तथा ज्ञेय (चेत्य) से संकुचित होकर 'चित्त' कहलाती है।
चिति ही चेतन-पद से अवरूढ़ (नीचे उतरी) होकर तथा ज्ञेय (चेत्य) से संकुचित होकर 'चित्त' कहलाती है।