Vijñāna Bhairava Tantra · 1.96

Vijñāna Bhairava Tantra 1.96

1.96
उपविश्यासने सम्यग्बाहू कृत्वार्धकुञ्चितौ । कक्षव्योम्नि मनः कुर्वन्शममायाति तल्लयात् ॥९६॥
upaviśyāsane samyag bāhū kṛtvārdhakuñcitau | kakṣavyomni manaḥ kurvan śamam āyāti tallayāt
anuṣṭubh
— बैठकर (क्त्वान्त) ; — आसन पर सम्यक् (अधिकरण + अव्यय) ; — बाहुओं को बनाकर (कर्म द्विवचन + क्त्वान्त) ; — अर्ध-कुञ्चित (आधे मुड़े हुए) — समासगत विशेषण ; — कक्ष (काँख) के व्योम (शून्य) में (अधिकरण — समासगत) ; — मन को रखता हुआ (कर्म + वर्तमान कृदन्त) ; — शान्ति को प्राप्त होता है (कर्म + वर्तमान काल) ; — उसके लय से (अपादान — समासगत)

आसन पर सम्यक् बैठकर, बाहुओं को अर्ध-कुञ्चित करके, कक्ष (काँख) के व्योम (शून्य) में मन को रखता हुआ (साधक) उसी के लय से शान्ति को प्राप्त होता है। (धारणा ७८)