Vijñāna Bhairava Tantra · 1.97

Vijñāna Bhairava Tantra 1.97

1.97
स्थूलरूपस्य भावस्य स्तब्धां दृष्टिं निपात्य च । अचिरेण निराधारं मनः कृत्वा शिवं व्रजेत् ॥९७॥
sthūlarūpasya bhāvasya stabdhāṃ dṛṣṭiṃ nipātya ca | acireṇa nirādhāraṃ manaḥ kṛtvā śivaṃ vrajet
anuṣṭubh
— स्थूल-रूप वाले पदार्थ की (षष्ठी — समासगत) ; — स्तब्ध (निश्चल) दृष्टि डालकर (कर्म + विशेषण + क्त्वान्त) ; — और (अव्यय) ; — शीघ्र, बिना देर किए (अव्यय) ; — मन को निराधार करके (कर्म + विशेषण + क्त्वान्त) ; — शिव को प्राप्त होता है (कर्म + विधि लिङ्)

स्थूल-रूप वाले किसी पदार्थ पर स्तब्ध (निश्चल) दृष्टि डालकर, और शीघ्र ही मन को निराधार करके (साधक) शिव को प्राप्त होता है। (धारणा ७९)