Śiva Sūtras · 1.15

Śiva Sūtras 1.15

1.15
हृदये चित्तसङ्घट्टाद्दृश्यस्वापदर्शनम् ॥१५॥
hṛdaye citta-saṅghaṭṭād dṛśya-svāpa-darśanam
sūtra
— हृदय में — हृदय (चेतना के केन्द्र) में (नपुं. एकवचन, अधिकरण कारक) ; — चित्त-सङ्घट्ट से — चित्त के मिलन/एकाग्रता से (पुं. एकवचन, अपादान, तत्पुरुष समास) ; — दृश्य-स्वाप-दर्शन — दृश्य के (मानो) स्वाप (निद्रावत् विलयन) का दर्शन (नपुं. एकवचन, तत्पुरुष समास)

हृदय में चित्त के सङ्घट्ट (एकाग्र मिलन) से दृश्य के स्वाप (विलयन) का दर्शन होता है।