Vijñāna Bhairava Tantra · 1.90

Vijñāna Bhairava Tantra 1.90

1.90
स्ववदन्यशरीरेऽपि संवित्तिमनुभावयेत् । अपेक्षां स्वशरीरस्य त्यक्त्वा व्यापी दिनैर्भवेत् ॥९०॥
svavad anyaśarīre'pi saṃvittim anubhāvayet | apekṣāṃ svaśarīrasya tyaktvā vyāpī dinair bhavet
anuṣṭubh
— अपने (शरीर) के समान (अव्यय) ; — दूसरे के शरीर में भी (अधिकरण — समासगत + अव्यय) ; — संवित् (चैतन्य-बोध) का अनुभव करे (कर्म + विधि लिङ्) ; — अपने शरीर की अपेक्षा को (कर्म + षष्ठी — समासगत) ; — छोड़कर (क्त्वान्त) ; — कुछ दिनों में व्यापी हो जाता है (कर्ता + करण + विधि लिङ्)

अपने (शरीर के) समान दूसरे के शरीर में भी संवित् (चैतन्य-बोध) का अनुभव करे; अपने शरीर की अपेक्षा छोड़कर कुछ दिनों में (साधक) व्यापी (सर्वव्यापी) हो जाता है। (धारणा ७२)