Vijñāna Bhairava Tantra · 1.89

Vijñāna Bhairava Tantra 1.89

1.89
ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽस्ति सम्बन्धे सावधानता ॥८९॥
grāhyagrāhakasaṃvittiḥ sāmānyā sarvadehinām | yogināṃ tu viśeṣo'sti sambandhe sāvadhānatā
anuṣṭubh
— ग्राह्य-ग्राहक का संवित् (बोध) — कर्ता कारक — समासगत ; — समान, साधारण (विशेषण) ; — सब देहियों का (षष्ठी बहुवचन) ; — किन्तु योगियों का विशेष है (षष्ठी + अव्यय + कर्ता + क्रिया) ; — (विषय-)सम्बन्ध में (अधिकरण कारक) ; — सावधानता (कर्ता कारक)

ग्राह्य (विषय) और ग्राहक (विषयी) का संवित् (बोध) सब देहियों में समान है; किन्तु योगियों का (इसमें) विशेष (अन्तर) है — (वे) सम्बन्ध में सावधान (जागरूक) रहते हैं। (धारणा ७१)