kiñcijjñair yā smṛtā śuddhiḥ sā śuddhiḥ śambhudarśane |
na śucir hy aśucis tasmān nirvikalpaḥ sukhī bhavet
anuṣṭubh
— अल्प-ज्ञानियों के द्वारा (करण कारक — समासगत); — जो शुद्धि मानी गई है (सम्बन्धवाचक + कर्मवाच्य भूत कृदन्त); — वह शुद्धि (कर्ता कारक); — शम्भु-दर्शन (शैव शास्त्र) में — अधिकरण — समासगत; — (वह) शुचि नहीं है — कर्ता कारक; — वस्तुतः, ही (अव्यय); — अशुचि भी नहीं — इसलिए (कर्ता कारक + अव्यय); — निर्विकल्प (साधक) सुखी हो जाता है — कर्ता + विधि लिङ्
अल्पज्ञों के द्वारा जो शुद्धि मानी गई है, वह शुद्धि शम्भु-दर्शन (शैव-शास्त्र) में शुद्धि नहीं है; (वहाँ) न शुचि है न अशुचि — इसलिए निर्विकल्प (साधक) सुखी हो जाता है। (धारणा ३६)