Vijñāna Bhairava Tantra · 1.54

Vijñāna Bhairava Tantra 1.54

1.54
किञ्चिज्ज्ञैर्या स्मृता शुद्धिः सा शुद्धिः शम्भुदर्शने । न शुचिर्ह्यशुचिस्तस्मान्निर्विकल्पः सुखी भवेत् ॥५४॥
kiñcijjñair yā smṛtā śuddhiḥ sā śuddhiḥ śambhudarśane | na śucir hy aśucis tasmān nirvikalpaḥ sukhī bhavet
anuṣṭubh
— अल्प-ज्ञानियों के द्वारा (करण कारक — समासगत) ; — जो शुद्धि मानी गई है (सम्बन्धवाचक + कर्मवाच्य भूत कृदन्त) ; — वह शुद्धि (कर्ता कारक) ; — शम्भु-दर्शन (शैव शास्त्र) में — अधिकरण — समासगत ; — (वह) शुचि नहीं है — कर्ता कारक ; — वस्तुतः, ही (अव्यय) ; — अशुचि भी नहीं — इसलिए (कर्ता कारक + अव्यय) ; — निर्विकल्प (साधक) सुखी हो जाता है — कर्ता + विधि लिङ्

अल्पज्ञों के द्वारा जो शुद्धि मानी गई है, वह शुद्धि शम्भु-दर्शन (शैव-शास्त्र) में शुद्धि नहीं है; (वहाँ) न शुचि है न अशुचि — इसलिए निर्विकल्प (साधक) सुखी हो जाता है। (धारणा ३६)