तन्नाना अनुरूपग्राह्यग्राहकभेदात् ॥३॥
tan nānā anurūpa-grāhya-grāhaka-bhedāt
sūtra
वह (विश्व) ग्राह्य (विषय) और ग्राहक (विषयी) के परस्पर अनुरूप भेद के कारण अनेक रूप वाला है।
वह (विश्व) ग्राह्य (विषय) और ग्राहक (विषयी) के परस्पर अनुरूप भेद के कारण अनेक रूप वाला है।