Vijñāna Bhairava Tantra · 1.99

Vijñāna Bhairava Tantra 1.99

1.99
कपालान्तर्मनो न्यस्य तिष्ठन्मीलितलोचनः । क्रमेण मनसो दार्ढ्यात्लक्षयेल्लक्ष्यमुत्तमम् ॥९९॥
kapālāntar mano nyasya tiṣṭhan mīlitalocanaḥ | krameṇa manaso dārḍhyāt lakṣayel lakṣyam uttamam
anuṣṭubh
— कपाल के भीतर (मन को स्थापित करके) — अधिकरण — समासगत ; — आँखें मूँदे हुए (समासगत विशेषण) ; — उत्तम लक्ष्य, परम लक्ष्य (कर्म कारक)

कपाल के भीतर (मन को स्थापित करके), आँखें मूँदकर, मन की दृढ़ता से क्रमशः उत्तम लक्ष्य (परम तत्त्व) को देखे।