Vijñāna Bhairava Tantra · 1.94

Vijñāna Bhairava Tantra 1.94

1.94
भ्रान्त्वा भ्रान्त्वा शरीरेण त्वरितं भुवि पातनात् । क्षोभशक्तिविरामेण परा संजायते दशा ॥९४॥
bhrāntvā bhrāntvā śarīreṇa tvaritaṃ bhuvi pātanāt | kṣobhaśaktivirāmeṇa parā saṃjāyate daśā
anuṣṭubh
— बार-बार चक्कर खाकर (पुनरुक्त क्त्वान्त) ; — शरीर से (करण कारक) ; — शीघ्र, त्वरित (अव्यय) ; — भूमि पर गिरने से (अधिकरण + अपादान) ; — क्षोभ-शक्ति के विश्राम से (करण — समासगत) ; — परा दशा उत्पन्न होती है (कर्ता + कर्मवाच्य वर्तमान)

शरीर से बार-बार चक्कर खाकर तेज़ी से भूमि पर गिरने से, क्षोभ-शक्ति के विश्राम से (विराम लेने से) परा-दशा (परम अवस्था) उत्पन्न होती है। (धारणा ७६)