Vijñāna Bhairava Tantra · 1.93

Vijñāna Bhairava Tantra 1.93

1.93
जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालाभङ्ग्यः प्रभा रवेः । ममैव भैरवस्यैता विश्वभङ्ग्यो विभेदिताः ॥९३॥
jalasyevormayo vahner jvālābhaṅgyaḥ prabhā raveḥ | mamaiva bhairavasyaitā viśvabhaṅgyo vibheditāḥ
anuṣṭubh
— जल की भाँति (षष्ठी + अव्यय) ; — लहरें (कर्ता कारक बहुवचन) ; — अग्नि की ज्वाला-भङ्गियाँ — षष्ठी + कर्ता बहुवचन — समासगत ; — सूर्य की प्रभा (कर्ता + षष्ठी) ; — मुझ भैरव की ही (षष्ठी + अव्यय) ; — ये विश्व-तरंगें (कर्ता बहुवचन — समासगत) ; — विभिन्न दीखती हैं (कर्मवाच्य भूत कृदन्त — बहुवचन)

जैसे जल की लहरें, अग्नि की ज्वालाएँ, सूर्य की किरणें (उन्हीं से उत्पन्न और अभिन्न हैं) — वैसे ही ये (नाना-रूप दीखने वाली) विश्व-तरंगें मुझ भैरव की ही (तरंगें) हैं, (केवल) विभिन्न दीखती हैं। (धारणा ७५)