— जल की भाँति (षष्ठी + अव्यय); — लहरें (कर्ता कारक बहुवचन); — अग्नि की ज्वाला-भङ्गियाँ — षष्ठी + कर्ता बहुवचन — समासगत; — सूर्य की प्रभा (कर्ता + षष्ठी); — मुझ भैरव की ही (षष्ठी + अव्यय); — ये विश्व-तरंगें (कर्ता बहुवचन — समासगत); — विभिन्न दीखती हैं (कर्मवाच्य भूत कृदन्त — बहुवचन)
जैसे जल की लहरें, अग्नि की ज्वालाएँ, सूर्य की किरणें (उन्हीं से उत्पन्न और अभिन्न हैं) — वैसे ही ये (नाना-रूप दीखने वाली) विश्व-तरंगें मुझ भैरव की ही (तरंगें) हैं, (केवल) विभिन्न दीखती हैं। (धारणा ७५)