— घट आदि में (अधिकरण — समासगत); — जो विज्ञान (ज्ञान) — सम्बन्धवाचक + कर्ता; — अथवा मेरे भीतर इच्छा आदि (कर्ता — समासगत + षष्ठी + अव्यय); — वह सर्व-गत ही नहीं हुआ है (कोई अलग नहीं) — कर्ता + विशेषण + भूत कृदन्त; — ऐसी भावना करता हुआ सर्वग (सर्वव्यापी) हो जाता है (वर्तमान कृदन्त + अव्यय + कर्ता)
घट आदि (बाह्य पदार्थों) में जो विज्ञान (ज्ञान) है, अथवा मेरे भीतर जो इच्छा आदि हैं — वह सर्व-गत (सर्वव्यापी से उत्पन्न) ही है (कहीं अलग नहीं) — ऐसा भावना करता हुआ (साधक) सर्वग (सर्वव्यापी) हो जाता है। (धारणा ७०)