Vijñāna Bhairava Tantra · 1.88

Vijñāna Bhairava Tantra 1.88

1.88
घटादौ यच्च विज्ञानमिच्छाद्यं वा ममान्तरे । नैव सर्वगतं जातं भावयन्निति सर्वगः ॥८८॥
ghaṭādau yac ca vijñānam icchādyaṃ vā mamāntare | naiva sarvagataṃ jātaṃ bhāvayann iti sarvagaḥ
anuṣṭubh
— घट आदि में (अधिकरण — समासगत) ; — जो विज्ञान (ज्ञान) — सम्बन्धवाचक + कर्ता ; — अथवा मेरे भीतर इच्छा आदि (कर्ता — समासगत + षष्ठी + अव्यय) ; — वह सर्व-गत ही नहीं हुआ है (कोई अलग नहीं) — कर्ता + विशेषण + भूत कृदन्त ; — ऐसी भावना करता हुआ सर्वग (सर्वव्यापी) हो जाता है (वर्तमान कृदन्त + अव्यय + कर्ता)

घट आदि (बाह्य पदार्थों) में जो विज्ञान (ज्ञान) है, अथवा मेरे भीतर जो इच्छा आदि हैं — वह सर्व-गत (सर्वव्यापी से उत्पन्न) ही है (कहीं अलग नहीं) — ऐसा भावना करता हुआ (साधक) सर्वग (सर्वव्यापी) हो जाता है। (धारणा ७०)