Vijñāna Bhairava Tantra · 1.42

Vijñāna Bhairava Tantra 1.42

1.42
सर्वं देहगतं द्रव्यं वियद्व्याप्तं मृगेक्षणे । विभावयेत्ततस्तस्य भावना सा स्थिरा भवेत् ॥४२॥
sarvaṃ dehagataṃ dravyaṃ viyadvyāptaṃ mṛgekṣaṇe | vibhāvayet tatas tasya bhāvanā sā sthirā bhavet
anuṣṭubh
— देह में स्थित सब पदार्थ (कर्म कारक — समासगत) ; — व्योम (शून्य) से व्याप्त (समासगत विशेषण) ; — हे मृगनयनी! (सम्बोधन) ; — भावना करे (विधि लिङ्) ; — तब उसकी (अव्यय + षष्ठी एकवचन) ; — वह भावना (कर्ता कारक स्त्रीलिङ्ग) ; — स्थिर हो जाती है (विधि लिङ्)

हे मृगनयनी! देह में स्थित सब पदार्थों को व्योम (शून्य) से व्याप्त (के रूप में) भावना करे; तब उसकी वह भावना स्थिर हो जाती है। (धारणा २४)