Vijñāna Bhairava Tantra · 1.41

Vijñāna Bhairava Tantra 1.41

1.41
तनूदेशे शून्यतैव क्षणमात्रं विभावयेत् । निर्विकल्पं निर्विकल्पो निर्विकल्पस्वरूपभाक् ॥४१॥
tanūdeśe śūnyataiva kṣaṇamātraṃ vibhāvayet | nirvikalpaṃ nirvikalpo nirvikalpasvarūpabhāk
anuṣṭubh
— देह के किसी एक अंश में, शरीर के एक भाग में (अधिकरण — समासगत) ; — शून्यता ही (कर्ता कारक + अव्यय) ; — मात्र क्षण-भर के लिए (कर्म कारक — समासगत) ; — भावना करे (विधि लिङ् — णिजन्त) ; — निर्विकल्प (विषय) को — कर्म कारक ; — वह निर्विकल्प हो जाता है (कर्ता कारक) ; — निर्विकल्प-स्वरूप का भागी (कर्ता कारक — समासगत)

देह के किसी एक अंश में मात्र क्षण-भर के लिए शून्यता की ही भावना करे; निर्विकल्प (विषय) का (चिन्तन करता हुआ) निर्विकल्प हो जाता है और निर्विकल्प-स्वरूप का भागी बन जाता है। (धारणा २३)