Vijñāna Bhairava Tantra · 1.43

Vijñāna Bhairava Tantra 1.43

1.43
देहान्तरे त्वग्विभागं भित्तिभूतं विचिन्तयेत् । न किञ्चिदन्तरे तस्य ध्यायन्नध्येयभाग्भवेत् ॥४३॥
dehāntare tvagvibhāgaṃ bhittibhūtaṃ vicintayet | na kiñcid antare tasya dhyāyann adhyeyabhāg bhavet
anuṣṭubh
— देह के भीतर (अधिकरण — समासगत) ; — त्वचा के विभाग को (कर्म कारक — समासगत) ; — दीवार-स्वरूप, भित्ति की भाँति (समासगत विशेषण) ; — चिन्तन करे (विधि लिङ्) ; — उसके भीतर कुछ भी नहीं — कर्ता कारक ; — ध्यान करता हुआ (वर्तमान कृदन्त) ; — अध्येय (ध्येय-रहित परम) का भागी हो जाता है — कर्ता कारक

देह के भीतर त्वचा के विभाग को (मानो) दीवार-स्वरूप चिन्तन करे — उसके भीतर कुछ भी नहीं (है, ऐसा); इस प्रकार ध्यान करते हुए वह ध्येय-रहित (अध्येय परम तत्त्व) का भागी हो जाता है। (धारणा २५)