Vijñāna Bhairava Tantra · 1.10

Vijñāna Bhairava Tantra 1.10

1.10
देवि प्रकृतिरूपा या तस्याः किं रूपमुच्यते । सकलत्वे विकल्पानां सकलाद्वैतकल्पना ॥१०॥
devi prakṛtirūpā yā tasyāḥ kiṃ rūpam ucyate | sakalatve vikalpānāṃ sakalādvaitakalpanā
anuṣṭubh
— हे देवि! (सम्बोधन) ; — प्रकृति-स्वरूपा (कर्ता कारक स्त्रीलिङ्ग) ; — जो (सम्बन्धवाचक सर्वनाम स्त्रीलिङ्ग) ; — उसका, उसकी (षष्ठी एकवचन स्त्रीलिङ्ग) ; — क्या रूप? (कर्ता कारक) ; — कहा जाता है (कर्मवाच्य वर्तमान) ; — सकलत्व में, अंश-युक्त अवस्था में (अधिकरण कारक) ; — विकल्पों की, मानसिक कल्पनाओं की (षष्ठी बहुवचन) ; — सकल-अद्वैत-कल्पना — सकल का अद्वैत-रूप काल्पनिक निर्माण (कर्ता कारक — समासगत)

हे देवि! जो प्रकृति-रूपा है, उसका क्या रूप कहा जाता है? सकलावस्था में (अर्थात् विकल्प-युक्त अवस्था में) तो वह विकल्पों की सकल-अद्वैत-कल्पना मात्र है।