— इच्छा में (अधिकरण कारक); — अथवा ज्ञान में (अव्यय + अधिकरण कारक); — उत्पन्न होने पर (सति-सप्तमी); — चित्त को निवेशित करे (कर्म + विधि लिङ्); — आत्म-बुद्धि से अनन्य-चित्त (समासगत विशेषण); — तब तत्त्वार्थ का दर्शन (होता है) — अव्यय + कर्ता — समासगत
अथवा इच्छा या ज्ञान के उत्पन्न होने पर चित्त को (उसी पर) निवेशित करे; आत्म-बुद्धि से अनन्य-चित्त होकर तब (साधक को) तत्त्वार्थ का दर्शन होता है। (धारणा ६३)