Vijñāna Bhairava Tantra · 1.82

Vijñāna Bhairava Tantra 1.82

1.82
निर्निमित्तं भवेज्ज्ञानं निराधारं भ्रमात्मकम् । तत्त्वतः कस्यचिन्नैतदेवंभावी शिवः प्रिये ॥८२॥
nirnimittaṃ bhavej jñānaṃ nirādhāraṃ bhramātmakam | tattvataḥ kasyacin naitad evaṃbhāvī śivaḥ priye
anuṣṭubh
— निर्निमित्त, निष्कारण (विशेषण) ; — ज्ञान उत्पन्न हो (कर्ता + विधि लिङ्) ; — निराधार (विशेषण) ; — भ्रम-रूप, भ्रामक स्वभाव वाला (समासगत विशेषण) ; — तत्त्वतः वह किसी का (वैयक्तिक) नहीं — अव्यय + सर्वनाम + निषेध ; — ऐसी भावना करने वाला शिव हो जाता है, हे प्रिये (विशेषण + कर्ता + सम्बोधन)

हे प्रिये! निर्निमित्त (निष्कारण), निराधार, भ्रम-रूप ज्ञान उत्पन्न हो (तो वह) तत्त्वतः किसी का (वैयक्तिक) नहीं है — ऐसी भावना करने वाला शिव हो जाता है। (धारणा ६४)