— हृदय-आकाश में (अधिकरण — समासगत); — लीन (निलीन) इन्द्रियों वाला (समासगत विशेषण); — पद्म-सम्पुट (कमल के दलों के बीच) के मध्य में स्थित (समासगत विशेषण); — अनन्य-चित्त, एकाग्र-चित्त (समासगत विशेषण); — हे सुभगे! (सम्बोधन); — परम सौभाग्य प्राप्त करे (कर्म कारक + विधि लिङ्)
हे सुभगे! हृदय-आकाश में नीचे-निलीन इन्द्रियों वाला, पद्म-सम्पुट (कमल के दोनों दलों के बीच) के मध्य में स्थित, अनन्य-चित्त (एकाग्र-चित्त) साधक परम सौभाग्य को प्राप्त करता है। (धारणा २६)