Vijñāna Bhairava Tantra · 1.39

Vijñāna Bhairava Tantra 1.39

1.39
पृष्ठशून्यं मूलशून्यं युगपद्भावयेच्च यः । शरीरनिरपेक्षिण्या शक्त्या शून्यमना भवेत् ॥३९॥
pṛṣṭhaśūnyaṃ mūlaśūnyaṃ yugapad bhāvayec ca yaḥ | śarīranirapekṣiṇyā śaktyā śūnyamanā bhavet
anuṣṭubh
— पृष्ठ-शून्य, पीछे का शून्य (कर्म कारक — समासगत) ; — मूल-शून्य, नीचे का शून्य (कर्म कारक — समासगत) ; — एक साथ भावना करे (अव्यय + विधि लिङ्) ; — और (अव्यय) ; — जो (सम्बन्धवाचक — कर्ता) ; — शरीर से निरपेक्ष शक्ति के द्वारा (करण कारक — समासगत) ; — शून्य-मन वाला हो जाता है — कर्ता कारक

जो पृष्ठ-शून्य (पीछे का शून्य) और मूल-शून्य (नीचे का शून्य) — दोनों को एक साथ भावना करे, वह शरीर से निरपेक्ष शक्ति के द्वारा शून्य-मन वाला हो जाता है। (धारणा २१)