Vijñāna Bhairava Tantra · 1.38

Vijñāna Bhairava Tantra 1.38

1.38
निजदेहे सर्वदिक्कं युगपद्भावयेद्वियत् । निर्विकल्पमनास्तस्य वियत्सर्वं प्रवर्तते ॥३८॥
nijadehe sarvadikkaṃ yugapad bhāvayed viyat | nirvikalpamanās tasya viyat sarvaṃ pravartate
anuṣṭubh
— अपने देह में (अधिकरण — समासगत) ; — सब दिशाओं में (विशेषण — समासगत) ; — एक साथ, युगपत् (अव्यय) ; — भावना करे (विधि लिङ्) ; — व्योम, शून्य (कर्म कारक) ; — निर्विकल्प-मन वाले (षष्ठी एकवचन — समासगत) ; — उसके लिए, उसको (षष्ठी/सम्प्रदान) ; — सम्पूर्ण व्योम प्रवर्तित होता है, प्रकट होता है

अपने देह में सब दिशाओं में एक साथ व्योम (शून्य) की भावना करे; उस निर्विकल्प-मन वाले के लिए सर्व-व्योम (समस्त शून्य-स्वरूप) प्रवर्तित होता है। (धारणा २०)