Vijñāna Bhairava Tantra · 1.2

Vijñāna Bhairava Tantra 1.2

1.2
अद्यापि न निवृत्तो मे संशयः परमेश्वर । किं रूपं तत्त्वतो देव शब्दराशिकलामयम् ॥२॥
adyāpi na nivṛtto me saṃśayaḥ parameśvara | kiṃ rūpaṃ tattvato deva śabdarāśikalāmayam
anuṣṭubh
— आज भी, आज तक (अव्यय) ; — नहीं (निषेधार्थ अव्यय) ; — निवृत्त हुआ, हटा (कर्मवाच्य भूत कृदन्त) ; — मेरा (षष्ठी एकवचन) ; — संशय, संदेह (कर्ता कारक) ; — हे परमेश्वर! (सम्बोधन) ; — क्या? (प्रश्नवाचक) ; — रूप, स्वरूप (कर्ता कारक) ; — तत्त्वतः, वास्तव में (क्रियाविशेषण) ; — हे देव! (सम्बोधन) ; — शब्द-राशि और कलाओं से बना हुआ — वर्ण-समूह-स्वरूप (समासगत विशेषण)

हे परमेश्वर! फिर भी आज तक मेरा संशय निवृत्त नहीं हुआ — हे देव! वास्तव में (परम तत्त्व का) स्वरूप क्या है? क्या वह शब्द-राशि की कलाओं से बना है (अर्थात् वर्ण-समूह-स्वरूप है)?