Vijñāna Bhairava Tantra · 1.13

Vijñāna Bhairava Tantra 1.13

1.13
शक्तिशक्तिमतोर्यद्वदभेदः सर्वदा स्थितः । अतस्तद्धर्मधर्मित्वात्परा शक्तिः परात्मनः ॥१३॥
śaktiśaktimator yadvad abhedaḥ sarvadā sthitaḥ | atas taddharmadharmitvāt parā śaktiḥ parātmanaḥ
anuṣṭubh
— शक्ति और शक्तिमान् (शक्ति-धारी) का (षष्ठी द्विवचन — समासगत) ; — जिस प्रकार, जैसा (सम्बन्धवाचक अव्यय) ; — अभेद, अभिन्नता (कर्ता कारक) ; — सदैव (अव्यय) ; — स्थित है (कर्मवाच्य भूत कृदन्त) ; — इसलिए (अव्यय) ; — उसके धर्मों को धारण करने के कारण (अपादान/हेतु — समासगत) ; — परा शक्ति (कर्ता कारक) ; — परम आत्मा की (षष्ठी एकवचन)

जैसे शक्ति और शक्तिमान् (शक्तिधारी) में सर्वदा अभेद ही स्थित रहता है, उसी प्रकार धर्म-धर्मित्व के कारण परम-आत्मा की परा शक्ति (उससे अभिन्न) है।