Śiva Sūtras · 1.7

Śiva Sūtras 1.7

1.7
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसम्भवः ॥७॥
jāgrat-svapna-suṣupta-bhede turyābhoga-sambhavaḥ
sūtra
— जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्त-भेद — जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के भेद में (पुं. एकवचन, अधिकरण कारक, द्वन्द्व+तत्पुरुष) ; — तुर्य-आभोग-सम्भव — चतुर्थ (तुर्य) के आभोग (आनन्द-विस्तार) की उत्पत्ति (पुं. एकवचन, तत्पुरुष समास)

(योगी के लिए) जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के भेद में भी तुर्या (चतुर्थ अवस्था) के आभोग (आनन्द-विस्तार) का सम्भव होता है।