Vijñāna Bhairava Tantra · 1.79

Vijñāna Bhairava Tantra 1.79

1.79
झगितीच्छां समुत्पन्नामवलोक्य शमं नयेत् । यत एव समुद्भूता ततस्तत्रैव लीयते ॥७९॥
jhagitīcchāṃ samutpannām avalokya śamaṃ nayet | yata eva samudbhūtā tatas tatraiva līyate
anuṣṭubh
— सहसा, अचानक (अव्यय) ; — उत्पन्न इच्छा को (कर्म कारक + भूत कृदन्त) ; — देखकर (क्त्वान्त) ; — शान्त कर दे, शम को पहुँचाये (कर्म + विधि लिङ्) ; — जहाँ से ही उत्पन्न हुई थी (अपादान + अव्यय + भूत कृदन्त) ; — वहीं लीन हो जाती है — अव्यय + वर्तमान कर्मवाच्य

सहसा उत्पन्न इच्छा को देखकर (तत्क्षण) शान्त कर दे; जहाँ से वह उत्पन्न हुई थी, वहीं वह लीन हो जाती है। (धारणा ६१)