Vijñāna Bhairava Tantra · 1.46

Vijñāna Bhairava Tantra 1.46

1.46
यथा तथा यत्र तत्र द्वादशान्ते मनः क्षिपेत् । प्रतिक्षणं क्षीणवृत्तेर्वैलक्षण्यं दिनैर्भवेत् ॥४६॥
yathā tathā yatra tatra dvādaśānte manaḥ kṣipet | pratikṣaṇaṃ kṣīṇavṛtter vailakṣaṇyaṃ dinair bhavet
anuṣṭubh
— जिस-जिस प्रकार से (अव्यय-युग्म) ; — जहाँ-जहाँ भी (अव्यय-युग्म) ; — द्वादशान्त में (अधिकरण — समासगत) ; — मन को क्षेपण करे, फेंके (कर्म + विधि लिङ्) ; — प्रति-क्षण (अव्ययीभाव) ; — क्षीण-वृत्ति वाले के लिए (षष्ठी — समासगत) ; — वैलक्षण्य, अद्भुत दिव्य-अनुभव (कर्ता कारक) ; — कुछ दिनों में हो जाता है — करण + विधि लिङ्

जिस-जिस प्रकार से, जहाँ-जहाँ भी द्वादशान्त में मन को क्षेपण करे (फेंके) — प्रति-क्षण क्षीण-वृत्ति (साधक) को कुछ ही दिनों में वैलक्षण्य (अद्भुत दिव्य-अनुभव) प्राप्त होता है। (धारणा २८)