Vijñāna Bhairava Tantra · 1.85

Vijñāna Bhairava Tantra 1.85

1.85
इन्द्रजालमयं विश्वं व्यस्तं वा चित्रकर्मवत् । भ्रमद्वा ध्यायतः सर्वं पश्यतश्च सुखोदयः ॥८५॥
indrajālamayaṃ viśvaṃ vyastaṃ vā citrakarmavat | bhramadvā dhyāyataḥ sarvaṃ paśyataś ca sukhodayaḥ
anuṣṭubh
— इन्द्रजाल-मय विश्व (कर्म कारक — समासगत) ; — व्यस्त (बिखरा हुआ) (विशेषण) ; — अथवा (अव्यय) ; — चित्र-कर्म (चित्रकला) के समान (समासगत विशेषण) ; — भ्रमत्, घूमता हुआ (वर्तमान कृदन्त) ; — अथवा (अव्यय) ; — ध्यान करने वाले के लिए (षष्ठी एकवचन) ; — और सब देखते हुए के लिए (कर्म + वर्तमान कृदन्त + अव्यय) ; — सुख का उदय (कर्ता कारक — समासगत)

विश्व को इन्द्रजाल-मय, व्यस्त (बिखरा हुआ), चित्र-कर्म (चित्र-कला) के समान, अथवा भ्रमते हुए के रूप में ध्यान करते हुए और देखते हुए (साधक को) सुख का उदय होता है। (धारणा ६७)