Vijñāna Bhairava Tantra · 1.83

Vijñāna Bhairava Tantra 1.83

1.83
चिद्धर्मा सर्वदेहेषु विशेषो नास्ति कुत्रचित् । अतश्च तन्मयं सर्वं भावयन्भवजिज्जनः ॥८३॥
ciddharmā sarvadeheṣu viśeṣo nāsti kutracit | ataś ca tanmayaṃ sarvaṃ bhāvayan bhavajij janaḥ
anuṣṭubh
— चित्-धर्म (चैतन्य-स्वरूप) वाले (समासगत विशेषण) ; — सब देहों में (अधिकरण बहुवचन — समासगत) ; — कहीं विशेष (भेद) नहीं है — कर्ता + निषेध + अव्यय ; — और इससे (अव्यय-युग्म) ; — तन्मय सब, सब उसी (चित्) -मय (कर्म कारक) ; — भावना करता हुआ (वर्तमान कृदन्त) ; — भव-जित् (संसार-विजयी) पुरुष (कर्ता कारक — समासगत)

सब देहों में चित्-धर्म (चैतन्य-स्वरूप) है, कहीं कोई विशेष (भेद) नहीं है — इस प्रकार सर्व को तन्मय (चित्-स्वरूप) भावना करते हुए (साधक) भव-जित् (संसार-विजयी) हो जाता है। (धारणा ६५)