तथा यत्परमार्थेन येन यत्र यथा स्थितम् ।
तत्तथा बलमाक्रम्य न चिरात्सम्प्रवर्तते ॥५॥
tathā yat paramārthena yena yatra yathā sthitam |
tat tathā balam ākramya na cirāt sampravartate ||
anuṣṭubh
— तथा, उसी प्रकार (अव्यय); — जो (कुछ भी) — नपुं.कर्ता एक. सम्बन्धवाचक; — परमार्थतः, परम सत्य से (करण कारक); — जिसके द्वारा — पु.करण एक. सम्बन्धवाचक; — जहाँ, जिस (अवस्था) में (सम्बन्धवाचक अव्यय); — जैसे, जिस प्रकार (सम्बन्धवाचक अव्यय); — स्थित — विद्यमान (भूत कृदन्त, कर्ता कारक); — वह — नपुं.कर्ता एक. सर्वनाम; — तथा, उसी प्रकार (अव्यय); — (स्पन्द-)बल का आक्रमण करके, आश्रय लेकर (पूर्वकालिक क्रिया-पदबन्ध); — अचिर में, शीघ्र (अव्यय); — सम्प्रवर्तित होता है, घटित होता है (वर्तमान काल)
वैसे ही जो जिस प्रकार, जिसके द्वारा, जहाँ परमार्थतः स्थित है — वह उसी प्रकार (स्पन्द) बल को आक्रमण करके (आश्रित होकर) शीघ्र ही प्रकट हो जाता है।