Stanzas on the Divine Pulsation · 1.19

Stanzas on the Divine Pulsation 1.19

1.19
गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥१९॥
guṇādi-spanda-niṣyandāḥ sāmānya-spanda-saṃśrayāt | labdhātma-lābhāḥ satataṃ syur jñasyāparipanthinaḥ ||
anuṣṭubh
— गुण आदि के स्पन्द-निःस्यन्द — विशेष स्पन्द-प्रवाह (कर्ता कारक बहुवचन — समासगत) ; — सामान्य स्पन्द के आश्रय से (अपादान कारक — समासगत) ; — जिन्होंने अपनी सत्ता पा ली है (कर्ता कारक बहुवचन — समासगत) ; — निरन्तर, सतत (अव्यय) ; — हों (विधिलिङ्ग, तृ.पु.बहु. √अस्) ; — ज्ञानी का, जानने वाले का (षष्ठी एकवचन) ; — अपरिपन्थी — बाधा न डालने वाले (विशेषण, बहुवचन)

गुण आदि के स्पन्द-प्रवाह सामान्य स्पन्द के आश्रय से अपना अस्तित्व पाकर निरन्तर उठते रहते हैं; ज्ञानी के लिए वे कभी बाधक नहीं होते।